(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 13 अनुशासनपर्व


॥ श्रीः ॥
13.201. अध्यायः 201
अथ दानधर्मपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति दानस्य पञ्चविधत्वकथनपूर्वकं तत्तल्लक्ष्यप्रदर्शनम्॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Text

[युधिष्ठिर उवाच।

श्रुतं मे भवतस्तात सत्यव्रतपराक्रम।
दानधर्मेण महता ये प्राप्तास्त्रिदिवं नृपाः॥ 13-201-1(89173)
इमांस्तु श्रोतुमिच्छामि ध्रमान्धर्मभृतांवर।
दानं कतिविधं देयं किं तस्य च फलं लभेत्॥ 13-201-2(89174)
कथं केभ्यस्च धर्म्यं च दानं दातव्यमिष्यते।
कैः कारणैः कतिविधं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः॥ 13-201-3(89175)
भीष्म उवाच। 13-201-4x(7438)
शृणु तत्त्वेन कौन्तेय दानं प्रति ममानघ।
यथा दानं प्रदातव्यं सर्ववर्णेषु भारत॥ 13-201-4(89176)
धर्मादर्थाद्भयात्कामात्कारुण्यादिति भारत।
दानं पञ्चविधं ज्ञेयं कारणैर्यैर्निबोध तत्॥ 13-201-5(89177)
इह कीर्तिमवाप्नोति प्रेत्य चानुत्तमं सुखम्।
इति दानं प्रदातव्यं ब्राह्मणेभ्योऽनसूयता॥ 13-201-6(89178)
ददाति वा दास्यति वा मह्यं दत्तमनेन वा।
इत्यर्तिभ्यो निशम्यैव सर्वं दातव्यमर्थिने॥ 13-201-7(89179)
नास्याहं न मदीयोऽयं पापं कुर्याद्विमानितः।
इति दद्याद्भयादेव दृढं मूढाय पण्डितः॥ 13-201-8(89180)
प्रियो मे यं प्रियोऽस्याहमिति सम्प्रेक्ष्य बुद्धिमान्।
वयस्यायैवमक्लिष्टं दानं दद्यादतन्द्रितः॥ 13-201-9(89181)
दीनश्च याचते चायमल्पेनापि हि तुष्यति।
इति दद्याद्दरिद्राय कारुण्यादिति सर्वथा॥ 13-201-10(89182)
इति पञ्चविधं दानं पुण्यकीर्तिविवर्धनम्।
यथाशक्त्या प्रदातव्यमेवमाह प्रजापतिः॥] ॥ 13-201-11(89183)

इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि एकाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ 201 ॥

Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Footnotes

7-201-6 धर्मद्दानं व्याचष्टे इहेति॥ 7-201-7 अर्थादित्यस्य लक्षणमाह ददातीति॥


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